14 दिन बाद चंपक के चेहरे पर रौनक तो लौटी, पर फिर न खोने का भी भय...जानिए ऐसा क्या हुआ?

बाल मन को समझ पाना आसान नहीं। फिर कोई 16 महीने का बच्चा 14 दिन तक मां से दूर हो जाए और ऐसा बच्चा जिसका आहार मां का दूध हो तो उस पर क्या बीतती होगी इसका कल्पना कर के ही आम आदमी का शरीर सिहर उठता है। बच्चा ही क्यों उसकी मां पर इन 14 दिनों में क्या गुजरी होगी यह भी अकल्पनीय है। ऐसा ही कुछ हुआ वाराणसी की इस युवा पर्यावरण एक्टिविस्ट एकता शेखर और बेटी चंपक के साथ। एकता लंबी जद्दोजहद के बाद 2 जनवरी 2020 की सुबह जिला कारागार से रिहा हो कर घर पहुंचीं तो बेटी मां को देख कर रो उठी, मां का दिल तो पहले से ही रो रहा था। वह क्षण दोनों के असहज था, बेटी एक तरफ रो भी रही है और दूसरी ओर नाराजगी भी जता रही है। दोनों के लिए वह पल कैसा रहा होगा, उनकी भावना को समझने की कोशिश की जा सकती है पर उसे शब्दों में बांधना आसान नहीं।
मासूम चंपक जिसने अपने जीवन के 16 माह की एक भी रात मां के बिन न गुजारी हो। मां के साथ ही खेलना, मां के साथ ही सोना, मां के दूध के अलावा जिसका कोई आहार नहीं, वह एक-दो दिन नहीं पूरे 14 दिन तक मां से दूर रही। पूस की सर्द रात उसे मां की गोद नहीं मिली, वो वात्सल्य नहीं मिला। वह गुमसुम सी हो गई थी। आम तौर पर नन्हे बच्चे दादा-दादी संग खेल-खा कर रह जाते हैं लेकिन चंपक की दादी ने हर पल कोशिश की कि उसके चेहरे पर मुस्कान ला सकें। लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाईँ। वो रोती रही, घर के मेन गेट की ओर टकटकी लगाए रहती थी। जब भी गेट बजता उसे लगता कि मां आ गई। पांचवें दिन ही वह बीमार हो गई। उसे बाहर का खाना देने की कोशिश की गई लेकिन उसने कुछ भी नहीं खाया। एक दिन तो उसे उल्टियां भी हुईँ। उसके आंसू थम नहीं रहे थे। रोम-रोम रो रहा था।
14 दिन के बाद जब मां 2 जनवरी 2020 की सुबह जेल से रिहा हो कर घर पहुंची तो ऐसा नहीं था कि चंपक दौड़ कर मां की गोद में चली गई हो। वह मां को देख कर रो रही थी, मोती से आंसू छलक कर गाल पर बह आए थे। लेकिन वह मां की ओर देख भी नहीं रही थी। ये मासूम की मासूमियत भरा गुस्से का इजहार था। मां भी बेटी को देख एक पल को आगे बढी कि उसे फौरन गोद में उठा ले, सीने से लगा ले। लेकिन उसके पांव भी बच्ची के रुख को देख ठिठक गए। ये वो पल थे जब 14 दिन के बिछोह का दर्द दोनों की आंखों में सहज ही देखा जा सकता था।
लेकिन कुछ ही पल में दोनों मिले, मां ने बिटिया को गोद में उठा कर सीने से चिपका लिया। दोनों काफी देर तक आंसू बहाते रहे। मानों मां इन आसुंओ से अपने प्यार से उन 14 दिनों के बिछोह के गम की माफी मांग रही हो। इस वात्सल्य ने बच्ची के मन के भय और गुस्से को हर लिया। कुछ ही पल में गुस्सा प्यार में बदला और दोनों हिल-मिल गए। मासूम का चेहरा खिल उठा। वह मां के साथ खेलने लगी, चहकने लगी। घर की चहारदीवारी के भीतर लॉन में दोनों ने फुटबॉल खेला। पहले की तरह चंपक आगे-एकता पीछे। यह देख परिवार के लोग भी सहज हो गए।
हालांकि बच्ची का भय जा नहीं रहा था, 2-4 मिनट के लिए भी एकता, चंपक से दूर होती यानी बेडरूम से ड्राइंग रूम में ही आती तो वह मां-मां करने लगती, उसे डर लगता रहा कि कहीं फिर से मां उसे छोड़ न जाए। ऐसे में मां एकता भी उसके साथ ही चिपटी रही। हालांकि आज एकता से मिलने वालों की भी भीड़ रही। थोड़ी-थोड़ी देर पर उनके प्रशंसक, मीडिया के लोग पहुंचते रहे। उनसे मिलना भी था, बातें भी करनी थी। ऐसे में वह कभी चंपक के कमरे में जातीं तो अगले ही पल बैठक में लौटतीं। यह दिन दोनों के लिए अद्भुत, बेमिसाल रहा। लेकिन खुशी यही कि बच्ची को मां का प्यार मिल गया।