बालिग होने में बचे थे केवल 4 दिन, युवक ने शख्स पर चढ़ा दिया गाड़ी, कोर्ट ने कहा...जेल में नहीं रहेगा आरोपी

साल 2016 में तेज स्पीड में मर्सिडीज बेंज का शिकार होने के बाद एक शख्स की मौत हो गई. जो युवक यह महंगी गाड़ी चला रहा था, वह दुर्घटना वाले दिन 18 साल यानी बालिग होने से 4 दिन छोटा था. हालांकि इससे पहले युवक पर तीन बार ट्रैफिक नियम तोड़ने की वजह से फाइन लगाया जा चुका था. मर्सिडीज बेंज युवक के पिता की गाड़ी थी. गुरुवार को इसी मामले से जुड़ी एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह पुष्टि की है कि युवक एक भी दिन जेल में नहीं रहेगा. उसे जुवेनाइल यानी नाबालिग के तौर पर ट्रीट किया जाये. कहा कि अगर युवक दोषी पाया जाता है तो वह ऑब्जर्वेशन में रहेगा.
सुनवाई कर रहे जज जस्टिस दीपक गुप्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि 'हम कोई पहेली नहीं सुलझा रहे हैं. हम कानून में शब्द या विकल्प नहीं जोड़ सकते हैं. जब दो व्याख्याएँ संभव हैं, तो जुवेनाइल्स को दिये जाने वाले लाभ को चुनना चाहिए.' जस्टिस गुप्ता ने फैसले के ऑपरेटिव हिस्से को पढ़ते हुए कहा कि 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत कथित अपराध 'जघन्य' अपराध की श्रेणी में नहीं आता है. जज ने कहा कि जब कानूनी प्रावधान स्पष्ट है, तो अन्यथा इसकी व्याख्या करना संभव नहीं है. हम कानून से बंधे हैं.' मौजूदा मामले में, किशोर को हत्या के दोषी नहीं होने के कारण आईपीसी की धारा 304 के तहत आरोपित किया गया था. 

धारा 304 के तहत दो अलग-अलग अपराधों में अधिकतम सजा आजीवन कारावास और 10 साल तक की जेल है, कोई न्यूनतम सजा नहीं है. हालांकि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट यह कहता है कि किशोर को केवल 'जघन्य' अपराधों के मामलों में वयस्क मानने की कोशिश की जा सकती है, जहां न्यूनतम सजा सात साल की जेल है. वहीं जुवेनाइल बोर्ड का मानना ​​है कि इस अपराध में मामला आरोपी को वयस्क मान कर चलाया जाए क्योंकि उसे खतरों के बारे में पर्याप्त जानकारी थी और उसकी मानसिक क्षमता को देखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने इसके खिलाफ फैसला किया. पीड़ित की बहन ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.