रवि किशन बोले..वो पिता ही थे, जिनके कारण आज मैं स्टार बना, वरना 'गुंडा' बन जाता

मेरे पिता मेरे गुरु भी थे और भगवान भी। 31 दिसंबर तो हर साल आएगा, लेकिन मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता कि आज मैंने क्या खो दिया। अध्यात्म से लेकर जीवन जीना पिताजी ने ही सिखाया। वो पिता ही थे, जिनकी वजह से स्टार बना, वरना 'गुंडा' बन जाता। आज मैं बहुत अकेला हो गया हूं। ये दर्द है गोरखपुर के सांसद रवि किशन का। मंगलवार रात 11 बजे बीएचयू अस्पताल में इलाज के दौरान पिता की मौत की खबर मिलने के बाद रवि किशन बीएचयू पहुंचे। बीएचयू से मणिकर्णिका घाट तक अंतिम यात्रा निकाली गई।
सांसद रविकिशन ने पिता की अर्थी को जब कंधा दिया तो वह भावुक उठे। अंतिम संस्कार से पहले के विधि विधान के दौरान वह बार-बार भावुक नजर आए। रवि किशन की सफलता में उनके पिता का बहुत बड़ा योगदान था। उनके पिता श्याम नारायण शुक्ला का मानना था कि रवि किशन का जन्म ईश्वर के आशीर्वाद से हुआ है। रवि किशन ने बताया था कि पिता जी अक्सर उनकी पिटाई कर देते थे लेकिन वह हमेशा उनसे प्यार करते थे। अगर पिता जी ने मेरी पिटाई नहीं की होती तो आज मैं एक नशेड़ी या पुरुष वेश्या बन जाता।
सांसद रविकिशन ने एक साक्षात्कार में ये भी बताया था कि पिता जी ने मुझे रात में जल्दी सोने और सुबह जल्दी उठने की सीख दी जिसे मैं आज भी पालन करता हूं। रवि किशन पर उनके पिता का गहरा प्रभाव पड़ा है। पिता जी पुरोहित थे, इसलिए अध्यात्म की ओर उनकी रुचि जगी और रवि किशन भगवान शिव के भक्त हैं। रवि किशन के पिता ने उन्हें बताया था कि यह पूरी दुनिया एक माया है और शरीर और मन को शुद्ध रखना सीखो। रवि किशन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि भोजपुरी फिल्मों में जाने की सलाह भी उनकी मां ने ही दी थी।
रवि किशन के परिवार को बेहद गरीबी में दिन गुजारने पड़ रहे थे। वे मिट्टी के बने घर में रहते थे। एक समय ऐसा आया जब रविकिशन या तो मरने या गुंडा बनने की सोचने लगे थे। तभी उन्होंने महानायक अमिताभ बच्चन का डायलॉग सुना...मैं फेंके हुए पैसे नहीं लेता। इस डायलॉग ने उनका जीवन बदल दिया। पिता जी उन्हें जबरन डेयरी बिजनेस कराना चाहते थे लेकिन उनकी मां ने 500 रुपये दिए और रविकिशन जौनपुर से मुंबई चले गए। रवि किशन जब मुंबई आए तो उनके पास इतना पैसा नहीं था कि वे बस का टिकट खरीद सकें।
मूल रुप से जौनपुर के रहने वाले पंडित श्याम नारायण शुक्ला मुंबई में पुरोहित थे और उनका डेयरी का छोटा सा बिजनेस था। रवि किशन जब10 साल के थे तब उनके पिता का उनके चाचा के साथ विवाद हो गया और धंधा बंदकर दोनों को जौनपुर लौटना पड़ा। रवि किशन यहां करीब सात साल तक रहे लेकिन पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था। रवि किशन अक्सर पैसे बचाने के लिए पैदल ही आते-जाते थे। ज्यादातर समय वह वड़ापाव खाकर दिन गुजारते थे। करीब एक साल तक संघर्ष करने के बाद उन्हें फिल्म पीताबंर में काम करने का मौका मिला।