कोरोना ने बनाया मछलियों का कब्रिस्तान, हालात देख आंखें फटी की फटी रह जाएंगी

ऐसा ही एक मामला हिमाचल प्रदेश से सामने आया है जहां भाखड़ा डैम और गोविंद सागर झील में पैदा होने वाली लाखों रुपये की मछलियों को कोरोना वायरस के चलते गड्ढा खोदकर दफना देना पड़ा। मछुआरों के लिए यह एक सजा है जो कि उन्हें खून के आँसू रुला रही है। हालांकि मछुआरा एसोसिएशन ने अब यह फैसला कर लिया है कि जब तक कोरोना वायरस का प्रकोप थम नहीं जाता वह अपनी नावें मछली पकड़ने के लिए नहीं निकालेंगे। एसोसिएशन ने मछुआरों के लिए राहत पैकेज दिये जाने की मांग की है।
कोरोना वायरस ने जहां पूरी दुनिया की अर्थ व्यवस्था को अर्श से फर्श पर ला दिया है वहीं मछली उद्योग को भी भुखमरी की कगार पर ला दिया है। मछुआरों को लाखों रुपये कीमत की मछलियों की गडढा खोदकर दबा देना पड़ा। हालांकि अभी तक कोई ऐसी रिसर्च नहीं आई है जिससे प्रमाणित होता हो कि मछली से कोरोना का संक्रमण होता है।
ऐसा ही एक मामला हिमाचल प्रदेश से सामने आया है जहां भाखड़ा डैम और गोविंद सागर झील में पैदा होने वाली लाखों रुपये की मछलियों को कोरोना वायरस के चलते गड्ढा खोदकर दफना देना पड़ा। मछुआरों के लिए यह एक सजा है जो कि उन्हें खून के आँसू रुला रही है।

हालांकि मछुआरा एसोसिएशन ने अब यह फैसला कर लिया है कि जब तक कोरोना वायरस का प्रकोप थम नहीं जाता वह अपनी नावें मछली पकड़ने के लिए नहीं निकालेंगे। एसोसिएशन ने मछुआरों के लिए राहत पैकेज दिये जाने की मांग की है।
इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि लोगों ने दहशत के चलते मछली खरीदना बंद कर दिया है। जबकि कोरोना त्रासदी से पहले पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में यहां की मछलियां काफी पंसद की जाती थीं। मछली ही क्या कोरोना वायरस के चलते चिकन व मीट मंडी को भी तगड़ा झटका लगा है।

मछली पालन, मुर्गी पालन आदि व्यवसाय पूरी तरह ठप हो जाने से इन व्यवसाय से जुड़ी बड़ी आबादी को अब रोजी-रोटी के लाले पड़ने शुरू हो गए हैं।
इससे पहले सरकारी स्तर पर कहा गया था कि मछली और इसके उत्पाद कोरोना वायरस के वाहक नहीं हैं। लोग आशंकित न हों। मछली के उत्पाद पूर्णतया सुरक्षित है। केंद्रीय मत्स्य विभाग और संबंधित मंत्रालय पशुपालन डेयरी एवं मत्स्य से जारी एडवाइजरी में भी इस बात को सिरे से नकारा गया है कि मछली के सेवन से कोरोना वायरस फैलता है।