बाल-बाल बचीं फरहीन की खौफनाक दास्तां: “अगर मेरे बेटे का खतना हो गया होता तो जिंदा नहीं होते हम”:

कभी-कभी कुछ ऐसा होता है जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होती। ऐसी ही कहानी है फरहीन की, जो उन्मादी भीड़ के हाथों किसी तरह बच सकीं। फरहीन की ही कहानी में यह भी है कि कैसे हिंदू पड़ोसियों ने उन्हें जान बचाने में मदद की।
“अगर आज हम जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए कि हमारे बेटे का खतना नहीं हुआ था। हमने सोचा था कि थोड़ा बड़ा होने पर इसका खतना करवाएंगे। लेकिन इसी ने हमारे परिवार की जान बचा ली।” यह कहते हुए गला रुंध जाता है फरहीन का, जिनके भाई को घर से खींचकर हिंदुत्ववादी भीड़ ने मार डाला। उनके पति को भी बुरी तरह पीटा गया।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में जब हिंसा भड़की तो उस समय फरहीन अपने परिवार के साथ गोकुलपुरी के नजदीक भगीरथी विहार में थी। तभी करीब 50 लोगों की भीड़ धड़धड़ाती हुई उनके घर में घुस आई। भीड़ देखकर सबने खुद को कमरों में बंद कर लिया। लेकिन उन्मादी भीड़ ने दरवाज़े तोड़ दिए, घर में अलग तोड़फोड़ की और फरहीन के पति और भाई को खींचकर पीटते हुए ले गई। फरहीन के भाई की मौत हो गई और पति बेहोश हो गए थे जिन्हें मरा समझकर भीड़ ने छोड़ दिया।

फरहीन ने बताया, “हम चूना फैक्टरी के तीसरे फ्लोर पर रहते हैं। यह सबकुछ 25 फरवरी की शाम करीब 7.30 बजे हुआ। घर में मेरे पति और भाई के अलावा 5 महिलाएं और 6 बच्चे थे। मेरे बच्चे खौफ से कांप रहे थे जब उन्होंने भीड़ का शोर सुना। हम सबकों अपनी जान की फिक्र थी। मैंने बच्चों से कहा कि आवाज न करें।”

भीड़ ने फरहीन के भाई को एक बेड के नीचे से खींचकर निकाला। जब उसने जान की भीख मांगी तो भीड़ ने उसका मजाक उड़ाया। फरहीन बताती है, “हम दूसरे कमरे में ये सारी आवाजें सुन रहे थे। हमारी बिल्डिंग में सीसीटीव कैमरे लगे हैं, इसलिए भीड़ ने बिजली पहले ही काट दी थी और यह सब अंधेरे में हो रहा था। जब उन्होंने हमारे चीखने की आवाजें सुनी तो भीड़ ने पूछा क्या तुम मुसलमान हो। हमसे दरवाजा खोलने को भी कहा। वे देखना चाहते थे कि कमरे में कोई पुरुष तो नहीं छिपा है। जब हमने दरवाजा खोलने से इनकार किया तो भीड़ ने कहा कि ठीक है दरवाजा बंद ही रखो।” फरहीन बताती हैं कि इसके बाद भीड़ जाते-जाते घर का सारा सामान तोड़ कर गई।

फरहीन के मुताबिक कुछ देर बाद उसके पति ने दरवाज़ा खटखटाया। जब हमने दरवाजा खोला तो हमने देखा कि वह खून में लथपथ थे। उन्होंने सभी को भाग जाने को कहा। उन्हें लगता था कि भीड़ फिर से आ जाएगी। इसके बाद फरहीन सबके साथ नीचे आई तो देखा कि भीड़ ने किसी भी हिंदू परिवार पर हमला नहीं किया था।

“हिंदू पड़ोसियों ने हमें बचाया। उन्होंने हमारे पति को अपने घर में रख लिया और कहा कि घर छोटा है इसलिए वह उनके रिश्तेदार के घर चली जाएं। उन्होंने हमें चूड़ियां दीं, सिंदूर लगाया और दोपट्टा ठीक किया। जब हम वहां से निकल रहे थे तो हमने देखा कि ग्राउंड फ्लोर के सारे मकान बंद थे और लोग जा चुके थे। ग्राउंड फ्लोर पर बहुत से मुस्लिम परिवार भी रहते थे।“

फहीन आगे बताती हैं कि, “हम जब कॉलोनी से जा रहे थे तो हथियारबंद तिलकधारी लोगों ने हमें रोक लिया। उन्होंने पूछा कि हिंदू हो या मुसलमान। मेरे साथ उस वक्त मेरी मां, बहन, सास और बच्चियां थीं। मैंने कहा हिंदू हूं, तो उन्हें यकीन नहीं हुआ उन्होंने कहा कि हम मुसलमान की तरह लगते हैं। उन्होंने मेरे बेटे की पतलून उतार दी और देखा कि उसका खतना नहीं हुआ है। तभी उन्हें यकीन हुआ। फिर भी वे हमें शक से देखते रहे। लेकिन हम जल्दी से वहां से निकल आए और मेन रोड पर पहुंचकर ही सांस ली।”

फरहीन अब शाहदरा में अपने रिश्तेदारों के साथ रहती है। उसका पति आसिफ पहले से बेहतर है। लेकिन फरहीन का भाई मुशर्रफ भीड़ का शिकार हो गया। अगले दिन उसका शव एक नाले में मिला, जहां से उसके शव को जीटीबी अस्पताल लाया गया है। लेकिन अभी तक पोस्टमार्टम नहीं हुआ है।