लॉकडाउन : अब रेत के धोरों के बीच महक रही है केसर की खेती!

इरादे नेक व हौसले बुलन्द हो तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है। यह कर दिखाया है बज्जू उपखंड के आरडी के पास खेती कर रहे किसान राजेन्द्र बिश्नोई ने। राजेन्द्र कम पढा लिखे होने के बावजूद केसर बुवाई की और इस रेगिस्तानी इलाके में खेती को संभव कर दिखाया। उन्होंने इंटरनेट का सहारा लेकर केसर की खेती से जुड़ी मौसम से लेकर मिट्टी तक की पूरी जानकारी जुटाई। आज खेत में ६० से ७० पौधों पर केसर महक रही है।
केसर की खेती कश्मीर में होती है। किसान राजेन्द्र बिश्नोई ने रेत के धोरों में इसे लगाकर प्रगतिशील किसान के रूप में पहचान कायम की है। आसपास के किसान हैरान हैं और इसके बारे में जानकारी लेने आते है। पश्चिमी राजस्थान के रेतीले इलके बज्जू क्षेत्र में इंदिरा गांधी नहर आने के बाद इलाका आबाद हुआ है। अब कुछ मेहनती किसान रेतीली धोरों पर फसलों के साथ फल की पैदावार ले रहे है। अब केसर की खेती भी क्षेत्र मे होनी शुरू हो गई है।

किसान राजेन्द्र बिश्नोई ने बताया कि करीब एक वर्ष पहले वह बज्जू क्षेत्र के नगरासर गयातो के एक खेत में केसर के पौधे लगे देखे। नगरासर के किसान ने चिंता वक्त करते हुए कहा कि फसल नष्ट हो रही। तब वहां से केसर के बीज लाकर बज्जू से २० किलोमीटर दूर चक १ सीडब्लूबी में अपने खेत में अक्टूबर में केसर की बुवाई की। यह तय किया कि हर हालात में केसर की पैदावार करनी है। आज सभी पौधे केसर की पंखुडिय़ों से लकदक है। फूल पकने के बाद ठंडी छाव में सुखाकर केसर तैयार करेंगे। मई तक पुरी तरह फसल तैयार हो जाएगी।

किसान राजेन्द्र ने राजस्थान पत्रिका को बताया कि वर्तमान में रासायनिक खाद का उपयोग ज्यादा हो रहा है। केसर की फसल में घर पर तैयार गोबर खाद का उपयोग किया है। छिड़काव भी नीम के पानी, गौमूत्र व छाछ का किया है। तीन से चार दिन बाद केसर के पौधों को पानी दिया जाता है। गर्मी से बचाव के लिए पौधों पर छांव कर रखी है। राजेन्द्र ने बताया कि मेहनत करने व सफलता की ठान ले तो सब कुछ संभव है। अब खेत में १ बीघा जमीन पर करीब एक हजार केसर के पौधे लगाने का लक्ष्य तय किया है। आसपास के किसानों को भी इसकी खेती के लिए प्रेरित करेंगे। केसर के कारण सुबह-सुबह आसपास के क्षेत्र में केसर की खुशबू फैल जाती है।