हिंदू हों या फिर मुस्लिम, कोरोना से मरने वालों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं अब्दुल

दुनिया में कोरोना से फ्रंट लाइन पर हमारे डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स लड़ रहे हैं. वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं कि एक भी मरीज कोरोना से संक्रमित होकर अपनी जान न दे. लेकिन, इसके बाद भी संक्रमितों और मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है. ये ऐसी बिमारी है और ऐसा वक्त है कि मृतक का अंतिम संस्कार तक कायदे से नहीं हो पा रहा है. अपने तक शवों से दूर जा रहे हैं. ऐसे में गुजरात के सूरत के रहने वाले अब्दलु रहमान मालबरी किसी मसीहा के रूप में सामने आए हैं. 
सूरत में कोरोना वायरस से हुई अबतक सभी मौतों का अंतिम संस्कार अब्दुल ही करवा रहे हैं. मरने वाला चाहें हिंदू हो या मुसलमान. अब्दुल धर्म से भेदभाव किए बगैर और संक्रमण की चपेट में आने के डर के बिना ही ये काम कर रहे हैं. सूरत में अभी तक चार मौतें हुई हैं और सबका अंतिम संस्कार अब्दुल ने ही किया है. बीबीसी से बात करते हुए अब्दुल कहते हैं, पिछले 30 सालों से लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार कर रहा हूं. ऐसे लोग जिनका कोी नहीं होता है, उनके अंतिम वक्त में मैं उनका साथ देने की कोशिश करता. 

अब सूरत नगर निगम ने हमसे संपर्क किया है. कोरोना से होने वाली मौत के बाद शव को परिजनों को नहीं दिया जा रहा है तो मुझे ही दिया जा रहा है. अब मैं ऐसी शवों का भी अंतिम संस्कार कर रहा हूं. अच्छी बात ये है कि प्रशासन ने इस बार अब्दुल को ट्रेनिंग भी दी है. डिप्टी कमिश्नर ने उन्हें पीपीई किट का इस्तेमाल से लेकर शवों का अंतिम संस्कार करते हुए खुद को कैसे बचाइ, इन सबके बारे में उन्हें बता चुके हैं. वह अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार सूट, मास्क और दस्ताने पहनकर शवों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं. 

अब्दुल के मुताबिक़, कोरोना से कोई शख्स का निधन होता है तो उसके परिवार वालों को भी 14 दिन के लिए क्वारंटीन कर दिया जाता है. ऐसे में वे अपनों के अंतिम संस्कार में भी नहीं जा पाते हैं. अपनों की अंतिम विदाई न देख पाना दर्दनाक होता है. ऐसे में हम कोशिश करते हैं कि पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करें. अब्दुल एकता ट्रस्ट के नाम से एक संस्था भी चलाते हैं. ये संस्था पिछले 30 साल से अनाथों का अंतिम संस्कार करती है. इसके लिए उन्हें लोगों से सहयोग भी मिलता रहता है.