झारखंड में चार साल की बच्ची ने ऑनलाइन देखा मां का दाह-संस्कार, प्रशासन ने रांची से बिहार नहीं जाने दिया

गैजेट, तकनीक, ऑनलाइन की दुनिया से आज एक साल का बच्चा भी महरूम नहीं है. छोटे से छोटा बच्चा स्मार्टफ़ोन में कोई वीडियो देखते दिख जाएगा. लेकिन एक चार साल की बच्ची के लिए एक ऑनलाइन वीडियो शायद ज़िंदगी भर याद रहे. यह ऑनलाइन वीडियो उसकी मां के अंतिम संस्कार का था.
चार साल की सुहानी की मां बीमार थी. वह बिहार के नवादा जिले में अपने ससुराल में थी. सुहानी रांची के नामकुम में अपने नाना-नानी के पास थी. बीते गुरूवार की रात उसकी तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई. रात 12 बजे अपने पिता जितेंद्र कुमार को फोन किया और कहा पापा अब हम नहीं बचेंगे. सुहानी और मां को लेकर आ जाइए. एक झलक आप लोगों का देख लेंगे, तभी मुझे शांति मिलेगी.

सुबह होते-होते रानी (28) इस दुनिया से विदा हो चली थी. बिलखते पिता पहुंचे रांची जिला प्रशासन के पास. कहा जाने दीजिए बिहार. अनुमित नहीं मिली. इधर घर पर सब इंतजार में थे बिहार जाने के लिए. चार साल की सुहानी भी. लेकिन नाना जितेंद्र कुमार का जवाब सुन बिलख कर रोने लगी. पूरा परिवार एक दूसरे को पकड़ रोने लगा.

अर्थी बनने से लेकर उपर विदा होकर शमसान की ओर जाती मां को बेटी वीडियो कॉल से देखती रही. कभी मां को तो कभी रोते हुए नाना-नानी को. उसे अभी तक यकीन नहीं हुआ है कि मां मर चुकी है. हर फोन आने पर नानी से पूछती है, मां का फोन है क्या. बात कराओ मुझे भी.

इधर बीते 30 मार्च को राज्य के मंत्री आलमगीर आलम के पत्र पर रांची जिला प्रशासन ने 11 बसों से 600 से अधिक लोगों, जिसमें सबसे अधिक मजदूर थे, को रांची से दूसरे जिलों में भेजा था. हालांकि, इस पर काफी विवाद हुआ. सीएम हेमंत सोरेन ने रांची के डीसी राय महिमापद रे को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था. बाद में मीडिया में यह बात भी सामने आई कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के मुताबिक डीसी ने देर शाम अनुमति वापस ले ली थी. लेकिन तब तक लोग बसों में लदकर निकल चुके थे.

नेशनल प्रिंटिंग प्रेस में वेब सेक्शन के इंचार्ज जितेंद्र कुमार बताते हैं, ‘गुरूवार 2 अप्रैल की रात को बेटी की तबियत खराब हुई. इस दौरान उसके परिवारवाले कई हॉस्पिटल ले गए. अगले दिन सुबह 10 बजे खबर मिली कि मेरी बेटी नहीं रही. मेरा तो दिमाग काम करना ही बंद कर दिया.’

उन्होंने बताया, ‘फिर कुछ परिचितों के साथ नामकुम थाना गए. वहां कहा गया कि डीसी ऑफिस जाइए, वहीं से कुछ इंतजाम हो पाएगा. इधर बेटी के ससुराल से बार-बार फोन आ रहा था कि आपलोग आ रहे हैं कि नहीं. नतिनी सुहानी लगातार रोए जा रही थी, उसे मम्मी के पास जाना है.’

जितेंद्र बताते हैं, ‘फिर किसी ने कहा कि PRAGYAAM एप (झारखंड सरकार ने विषम परिस्थितियों में राज्य से बाहर जानेवालों के लिए या फिर राज्य में ही एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए ई-पास निर्गत करने के लिए यह एप बनाया है) से बाहर जाने का पास मिलेगा. एक घंटा मेहनत किए, लेकिन पास नहीं बना. फिर पहुंचे डीसी आवास. यहां पर कहा गया कि एक आदमी ही अंदर जाकर बात कर पाएगा. मेरे एक परिचित अंदर गए, बाहर आकर उन्होंने कहा कि जिला परिवहन कार्यालय जाना होगा.’

उन्होंने आगे कहा, ‘फिर वहां से भागे. ऑफिस अंदर से बंद था. बार-बार हल्ला करने पर दो लोग बाहर निकले. उन्होंने कहा कि परमिशन नहीं मिलेगी. थक-हार कर घर आ गया और बेटी के परिवार वालों को बता दिया कि मैं नहीं आ पाऊंगा.’

वह कहते हैं, ‘सबसे अधिक नातिन की चिंता है. वह ज्यादा टाइम हमारे साथ ही रही है. घुल मिल गई है. अगर उसके पिता कहेंगे कि वही रखेंगे तो क्या करेंगे हम. दिल पर पत्थर रखकर भेज देंगे. पता नहीं इसका भविष्य क्या होगा.’

परिवहन मंत्री चंपई सोरेन ने कहा कि मुझे भी इसके बारे में अभी जानकारी हुई है. मैं घर के कुछ काम में व्यस्त था. अधिकारियों से इस मामले में बात करता हूं, आगे ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए उपाय करने को कहता हूं. मुझे एक-दो दिन का समय दीजिए.

वहीं बीजेपी नेता और रांची के सांसद संजय सेठ इसे काफी असंवेदनशील मामला बताते हैं. उनका कहना है कि ‘ममता नहीं मरनी चाहिए. सत्ता आती है जाती है, लेकिन किसी भी सरकार को अपना मानवीय पक्ष खत्म नहीं करना चाहिए. इसमें जिला प्रशासन से मानवीय भूल हुई है. लॉकडाउन में ऐसी स्थितिया आगे भी आ सकती हैं, सरकार को इसके लिए तत्काल मजबूत सिस्टम बनाना चाहिए.’

इधर रांची के डीटीओ संजीव कुमार ने बताया कि उनके पास इस तरह का कोई आवेदन नहीं आया है. पता नहीं डीटीओ ऑफिस में कौन बोल दिया उनको कि पास नहीं मिलेगा. किसी भी विषम परिस्थिति में अगर कोई उनके नंबर पर प्रूफ के साथ सीधे मैसेज करता है, तो वह तुरंत पास मुहैया कराते हैं. जब तक लॉकडाउन है, आगे भी ऐसी व्यवस्था रहेगी.’

सुहानी आखिरी बार 10 दिन पहले मां से मिली थी. अब वह कभी नहीं मिल पाएगी. लेकिन ये लॉकडाउन उसे जीवन भर याद रहेगा. ऐसा दर्द जिसे वह शायद ही भुला पाए.