लॉकडाउन में लावारिश लाशों के लिए मसीहा बनी वर्षा वर्मा, 11 लावारिश लाशों का करा चुकी हैं अंतिम संस्कार!

वह एक महिला हैं। एक मां हैं एक बेटी हैं। एक पत्नी हैं। लेकिन, वह इन सबसे बढ़कर खुद को एक इंसान मानती हैं और अपनी ज़िंदगी इसी इंसानियत के फ़र्ज को निभाने में बिताना चाहती हैं। कोरोना वायरस के महामारी के दौर ने जब लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए घर की चारदिवारी में कैद हो गए, ये महिला सड़क पर थी। अपने लिए नहीं, बल्कि उनके लिए जिनका इस दुनिया में कोई नहीं। उनके लिए जिसे जीते जी तो सम्मान नहीं मिला, लेकिन मरने के बाद उसकी लाश सड़े न, बल्कि सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हो सके।
हम बात कर रहे हैं लखनऊ की रहने वाली वर्षा वर्मा की। वर्षा इस लॉकडाउन में अबतक 11 लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार करा चुकी हैं। महामारी के एक ऐसे समय में जब अपने भी अपनों का साथ छोड़ दे रहे हैं, वर्षा सड़कों पर हैं। जिनका कोई नहीं है, उनके लिए वह LIC का स्लोगन जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी बन गई हैं।
वर्षा कहती हैं, लॉकडाउन में लोग अपने घरों में कैद हो गए थे। इस दौरान मेरी नजर एक लावारिश लाश पर पड़ी। उसका अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं था। शहर में तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियों में रहने वाले लोगों का भी ध्यान इस ओर नहीं गया तो मैंने निश्चय कर लिया कि जिसका कोई नहीं, उसका साथ दूंगी। इस काम में उन्हें दीपक महाजन का साथ मिला। वह एक दिव्य कोशिश नाम की संस्था के अध्यक्ष हैं। इसके बाद दोनों ने मिलकर काम करना शुरू किया।
वर्षा पिछले कुछ वर्षों से ऐसे ग़रीब-असहाय लोगों के साथ भी काम कर रही थीं, जिनका कोई नहीं था। ऐसे में उनका इलाज कराना। उनके खाने-पीने की व्यवस्था करना और इसके बाद भी उनका निधन हो जाता है उनका अंतिम संस्कार करना। इन चीजों की जिम्मेदारी वह कुछ वर्षों से उठाने की कोशिश में लगी हैं लेकिन, लॉकडाउन में यह काम उनके लिए चुनौती रही। इसमें जो लोग मिले, उनसे संक्रमण का भी खतरा था। लेकिन, उन्होंने हेल्थ एक्सपर्ट्स के सभी मानकों को फॉलो करते हुए इस महामारी के दौर में भी काम किया।
वर्षा चार दिन पहले हुई एक घटना का जिक्र करते हुए कहती हैं, एक 60 साल का व्यक्ति रोड एक्सीडेंट में घायल हो गया था। उसे इलाज  के लिए लखनऊ के केजीएमयू में ले जाया गया। उसके पैरों में गंभीर चोट लगी थी, जिससे अधिक मात्रा में खून बह गया था। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद जब उसकी लाश मिली तो उससे बहुत बदबू आ रही थी। लेकिन, उनकी टीम ने बिना घबड़ाए लाश का भैंसा कुंड विद्युत शवदाह गृह में दाह संस्कार कराया। उनका कहना है कि इस लॉकडाउन में ये 11वीं लाश थी, जिसका अंतिम संस्कार उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर किया। इसके पहले भी ऐसे ही सड़क पर मिली 10 लाशों का वह अंतिम संस्कार करा चुकी हैं। उन्हें लगता है कि लॉकडाउन के इस मुश्किल घड़ी में उन्हें और मजबूती से ऐसे लोगों के साथ खड़ा रहना चाहिए।
उनका कहना है कि वह बुजुर्ग महिलाओं को खाना-खिलाने से लेकर उन्हें नहलाने-धुलाने तक का काम करती हैं। एक मां के लिए उनकी बेटी जो-जो कर सकती है, वह सबकुछ उन महिलाओं के लिए करती हैं, जिनका इस दुनिया में कोई नहीं होता है। वह यह सारा काम बिना किसी सरकारी सहयोग के करती हैं। हां, कुछ दोस्तों-साथियों से उन्हें सहयोग मिलता रहता है।