आखिर सैटेलाइट पर क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत? हैरान हो जाएंगे जानकर!

सैटेलाइट के बारे में तो आप जानते ही होंगे, जिसे भारत में कृत्रिम उपग्रह कहा जाता है। पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1, सोवियत संघ द्वारा चार अक्तूबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में भेजा गया था। तब से लेकर आज तक हजारों कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजा जा चुका है। क्या आप जानते हैं कि सैटेलाइट पर सोने की परत चढ़ाई जाती है? जी हां, आपको यह जानकर हैरानी तो हो रही होगी, लेकिन इसके पीछे एक बेहद ही खास वजह है। चलिए जानते हैं आखिर क्यों ऐसा किया जाता है?
आपको शायद पता न हो, लेकिन अंतरिक्ष में भेजा जाने वाला कोई भी सैटेलाइट सोने सी परत में ही लपेटा जाता है। उसे मल्टी लेयर इंसुलेशन कहते हैं। यह काफी हल्का लेकिन बेहद ही मजबूत होता है। दरअसल, पतली-पतली सतहों को मिलाकर एक मोटी परत बनाई जाती है, जिसे आम भाषा में 'गोल्ड प्लेटिंग जबकि वैज्ञानिक भाषा में मल्टी लेयर इंसुलेशन कहा जाता है।
सोने की परत का इस्तेमाल उस सैटेलाइट में करना जरूरी होता है, जिसे अंतरिक्ष में दूर तक भेजना होता है। दरअसल, वैज्ञानिकों के मुताबिक सोना सैटेलाइट की परिवर्तनशीलता, चालकता और जंग के प्रतिरोध को रोकता है। इसके अलावा इसमें लगी अन्य धातुओं की परत हानिकारक इन्फ्रारेड रेडिएशन और थर्मल रेडिएशन को रोकने में मदद करती है।
वैज्ञानिकों की मानें तो अगर सोना और अन्य धातुओं से बनी परत से सैटेलाइट को नहीं ढंका जाएगा, तो अंतरिक्ष के खतरनाक रेडिएशन सैटेलाइट को पलभर में नष्ट कर देंगे। अब चूंकि सैटेलाइट में कई तरह के नाजुक उपकरण भी लगाए जाते हैं, ऐसे में ये परत सैटेलाइट से टकराने वाली किसी भी वस्तु से बचाती है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि अंतरिक्ष यात्रियों के स्पेस सूट में भी सोने और अन्य धातुओं से बनी परत का इस्तेमाल होता है। अपोलो लूनर मॉड्यूल में भी नासा ने सैटेलाइट बनाने में सोने का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा चंद्रयान के एक हिस्से में भी सोने की ऐसी ही परत चढ़ाई गई थी।